Poetry
कदम ये अब किसी ओर आगे बढ़तें नहीं
जो टूट भरोसा अब ये फिर से कहीं जुड़ता नहीं
वो वक़्त कुछ और था अब वक़्त कुछ और है
सपने देखें थें कुछ ज़िंदगी के, पर हुआ कुछ और है
हम भले थें खुद की राह पर चल कर
इस अंजान सी राह पर ना मालूम है की जाना किस ओर है
खुद ही हम खुद से बिछड़े से हुयें है
मालूम नहीं हम खुद किस ज़िद पे अड़े हैं
रुक गयें हम किसी अंजान चौराहे पर आके
हो गयें हैं बड़े मजबूर से खुद को इस मोड़ पे लाके


