आयें थें हम मुहब्बत की बाज़ी लगानें

Law life aur multigyan
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Poetry 


आयें थें हम मुहब्बत की बाज़ी लगानें

पर हम हार कर गयें  

ये भरम था हमें की वो हमारे पास हैं 

पर न जाने कब हमारे किनारे अलग हो गयें

वो बिन बताये कोई वजह हमसे जुदा हो गयें

नज़रों के सामनें से कब ओझल हो गयें 

और हमारे ख्वाबों के खुदा बन गयें 

अब ख्वाबों से अलग कहीं उनसे मिलना होता नहीं 

इस दूरी की वजह क्या है हमसे वो आकर कहतें नहीं 

हमें यकीन था अपनी जीत का इस मुहब्बत के सफर में 

ना जानें कब हमसे वो इस सफर में अलग हो गयें 

जो हर पल में थें शामिल हमारे 

वो पल भर में जानें कहाँ खो गयें 




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