Poetry
ये इंतज़ार इतना आसान तो नहीं
पर ये हो सबके नसीब में होता ऐसा कमाल तो नहीं
ये हर आशिक़ के नसीब में लिपटा कोई चोर सा है
इसमें गुज़रा हर एक पल मुहब्बत में जैसे भोर सा है
पार करके इस इंतज़ार की दरिया को
ना करे कोई शिकवा है सच्चा आशिक़ वो
यूं ही इंतज़ार लफ्ज़ कह देने से भला कोई क्या समझता है
इस लफ्ज़ को जो जीये ज़िंदगी की तरह
एक बस वो ही इस इंतज़ार का दर्द समझता है
फिर भी समझ समझ कर इस इंतज़ार का खेल
हर आशिक़ मुहब्बत में अपनी किस्मत का इससे कराता है मेल
मुहब्बत में इस इंतज़ार से कौन बच पाता है
किसी को देकर अपना दिल वो इंतज़ार का दर्द संग अपने लाता है


