Poetry
ये बेबसी भी जैसे किसी अंधेरे सी है
पर आस मेरी आने वाले सवेरे सी है
जिस वक़्त का किया इंतज़ार वो वक़्त कभी आया नहीं
फिर भी है उम्मीद ज़िन्दा, ये मन भी कभी हारा नहीं
यूं हार मान कर ज़िन्दगी की जंग जीती जाती नहीं
अगर हार के बाद भी हौसला उठ खड़ा हो तो वो हार, हार मानी जाती नहीं
एक उम्मीद का दीया काफी है आगे के अंधियारे मिटानें को
हम भी तैयार से बैठें इस हार को मात दिलानें को
ये वक़्त भोर के पहले के घनें अंधेरे सा है
आगे वक़्त अनन्त सवेरे सा है
कल की फिकर को छोड़ कर अगले कल में जश्न मनाना है
हारा नहीं ये मन अभी तक ये ठहराव तो बस एक बहाना है


