जो अपना था कभी, अब वो पराया है

Law life aur multigyan
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Poetry 


जो अपना था कभी, अब वो पराया है 

मेरी रुह से दूर उसका साया है

क्या कोशिश करें उसे पानें की 

हर कोशिश से धूमिल हुयी काया है 

हर कोशिश का अंत जीत नहीं होती 

करलूं कोशिश हज़ार मेरी ज़िन्दगी मेरी नहीं होती 

इस रुठी ज़िन्दगी को मैं मनाऊं कैसे 

मुझसे दूर वो उस पार खड़ी है, पास उसके जाऊं कैसे 

जाने किस कर्ज़ में डूबा मेरा हर रोम है 

वो सब कुछ धुंधला सा है जो मेरे चारो ओर है 

बिखर कर जाने कितने टुकड़ों में चूर हो गयी 

मेरी ज़िन्दगी बिन कुछ कहे मुझसे दूर हो गयी 

क्या इल्ज़ाम करू उस पर 

ग़लती सारी मेरी है 

शायद हो जाये थोड़ी हम दोनों में

पर अभी थोड़ी सी देरी है 



 


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