वो कहतें हैं हमें

Law life aur multigyan
0

Poetry 


वो कहतें हैं हमें मुहब्बत की अदा आती नहीं 

मेरी हर बार होती है इल्तिजा उनसे 

वो हमें मुहब्बत की अदा सिखातें क्यों नहीं 

हर बार बस ख्वाबों में आकर हमें छेड़ जाने वाले

एक दफा सामनें हमारे तुम आते क्यों नहीं 

हो गयी मुहब्बत में तेरी लुका छिपी बहुत 

तुम आकर सामनें हमारे मुस्कुराते क्यों नहीं 

हम करतें रहतें हैं बस इंतज़ार तेरा 

अपने दिल को हम समझा पातें नहीं 

खोयी खोयी सी राहें तुम्हारी और हमारी 

अपनी राहों को हमारी राहों से मिलाते क्यों नहीं 

कई अरसे से हम पुकारा करतें है तुम्हें 

हमारी पुकार को कभी तुम सुनते क्यों नहीं 



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)