Poetry
वो कहतें हैं हमें मुहब्बत की अदा आती नहीं
मेरी हर बार होती है इल्तिजा उनसे
वो हमें मुहब्बत की अदा सिखातें क्यों नहीं
हर बार बस ख्वाबों में आकर हमें छेड़ जाने वाले
एक दफा सामनें हमारे तुम आते क्यों नहीं
हो गयी मुहब्बत में तेरी लुका छिपी बहुत
तुम आकर सामनें हमारे मुस्कुराते क्यों नहीं
हम करतें रहतें हैं बस इंतज़ार तेरा
अपने दिल को हम समझा पातें नहीं
खोयी खोयी सी राहें तुम्हारी और हमारी
अपनी राहों को हमारी राहों से मिलाते क्यों नहीं
कई अरसे से हम पुकारा करतें है तुम्हें
हमारी पुकार को कभी तुम सुनते क्यों नहीं


