ज़रा थाम ले मेरा हाथ ऐ ज़िन्दगी

Law life aur multigyan
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Poetry 


ज़रा थाम ले मेरा हाथ ऐ ज़िन्दगी 

 इन अंधेरो के पार ले चल मुझे 

मैं हार गया इन राहों में 

तक़दीर की इन दरारों के बाहर जाना है मुझे 

ना लगा वक़्त और देर पहले ही हो चुकी 

जो जुटाई थी मैनें हिम्मत वो कबकी टूट चुकी 

तेरी हो जाये मर्ज़ी अगर, मिल जायेगा हौसला जरा सा मुझें

फिर ना लौटूंगा इन अंधियारों की ओर 

बस एक बार सहारा देदे मुझे 

ज़रा थाम ले मेरा हाथ ऐ ज़िन्दगी 

इन अंधेरों के पार ले चल मुझे 



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