हम कह ना सकें तुमसे

Law life aur multigyan
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Poetry 


हम कह ना सकें तुमसे, तुमनें भी समझनें की ज़िद ना की 

अब करते हो इल्ज़ाम हमपर, हमें तुमसे मुहब्बत ना थी 

हम कह भी दें ते तुमसे, पर तुम्हें सुनने की दिलचस्पी ना थी

हम थक गयें तुम्हारी राहें देखकर 

तुम आगे क्या गयें एक दफा भी ना देखा पलट कर 

हर किसी की मुहब्बत मुकम्मल कहाँ होती है 

पर आज भी तुझे याद कर मेरी ये आँखे रोती हैं

बिन तेरी रज़ामंदी के मैं हक रखूं तुझपर ऐसी मेरी ज़िद ना थी 

मैनें ना रखी कोई बन्दिश तेरे लिए अपनी मुहब्बत में 

फिर भी क्या वजह हुयी जो तूने मुझे अपनी मुहब्बत ना दी 

 


 

 

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