चलो मुहब्बत की ज़िद भी देख लेतें हैं

Law life aur multigyan
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Poetry 


चलो मुहब्बत की ज़िद भी देख लेतें हैं

ये करती है कितना हमें एक दूजे से ये भी देख लेतें हैं 

कब तक रहेंगें हम गुमनाम मुहब्बत के जहां में 

अपनें वक़्त का हम इंतज़ार कर लेतें हैं 

ज़रा रखना हिम्मत तुम, ज़रा हम भी जुटा लेंगे हौसला 

करना होगा इंतज़ार भले कई अरसे तक  

ना करेंगे टूटने का फैसला हम 

 माना अभी वक़्त हमारा नहीं 

पर हर बार वक़्त ऐसा होगा नहीं 

 अभी बाकी है कुछ दुरीयों का मिटना 

इन दुरीयों को भी मिटा देंगे हम 

इस वक़्त में ज़रा खुद को भी हम परख लेते हैं 

चलो ज़रा हौसला रख कर हम इस मुहब्बत को जीत लेतें हैं 








 

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