ऐ जिन्दगी चल अब तेरी भी जिद देख लेतें हैं

Law life aur multigyan
0
Poetry


ऐ जिन्दगी चल अब तेरी भी जिद देख लेतें हैं

तेरी दिये ग़मों को मुस्कुरा कर संग में रख लेतें हैं

मेरी जो ख्वाहिशें थीं तुझसे जुडी़

उन ख्वाहिशों को अधूरी छोड़ देतें हैं

अब तू ही दिखा वो रस्ता जिसपर आगे जाना है

तेरे दिये ग़मों से मुझसे दूर खडा़ ये ज़माना है

मुझे ज़रूरत नहीं किसी हमराही की 

तू अब राह में अपनी मेरा हाथ थामें रहना

चल ले चल मुझे उन गलियों में,जिसे चुन रखा है तूने मेरे लिये

मुझे तलाश नही अब खुद कि भी

तेरी उम्मीद लिये मैं जिन्दा हूँ

चल तू मुझे ले चल उस आसमान में

जिस आसमान का मैं आजाद परिन्दा हूँ





एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)