Poetry
बहुत से अर्सों को गुजरते देखा है मैंने खुद को मरते देखा है
जो कभी मेरे सायें सा था ,नये जीवन के आगाज़ सा था
मैने सबकुछ बिखरते देखा है, मैनें खुद को मरते देखा है
मन रहा घिरा किसी भीड़ में, ये उलझा रहा तकदीर में
पर तकदीर को मैनें रुठते देखा है, मैनें खुद को मरते देखा है
ये जिन्दगी इतनी आसान नहीं
कोई जाये अगर हार तो वो उसकी पहचान नहीं
हार के बाद अक्सर मैनें जीत को देखा है
पर यूं ही कोई हारता नहीं,कोई खुद को जीते जी मारता नहीं
किसी गहरी चोट का असर है ये
या किस्मत की कोई कसर है ये
मैनें धूप में मुरझायें फूलों को सांझ मे खिलते देखा है
मेरी हार है या मेरी जीत है ये, मेरी हिस्से की तकदीर है ये
खुश हूं उन जीतनें वालों के लिये
पर अक्सर बडी़ जीत होने के बाद लोगों के छोटा होते देखा है
घूम आये हम इस ज़माने में, मैनें खुद को छोटा होते देखा है
है मेरी कमी या किस्मत कमी, मैनें खुद के अहम को मरते देखा है
मैनें खुद को मरते देखा है


