Poetry
तुम हो गये उस पार के, ले गये खुद को दूर हमसे हमें मार के
ज़रा सा हक समझो हमारा खुद पर तो अपनी यादें छोड़ जाना तुम
वजह बस वो एक ही होगी जीने की
वो एक वजह पास मेरे रख जाना तुम
ना आते जिन्दगी में तुम, ना लगती आदत हमें तुम्हारी इबादत की
अब जाते हुये बता जाना ,आदत हम छोडे़ कैसे तुम्हारी आदत की
थी बन्दीश की वजह, थी वजह बन्दगी की
पर शायद तुमने किमत ना जानी मेरी बन्दगी की
हमसे दूर जाते हुये बता जाना बस ये, क्या किमत है नज़रों में तेरी मेरी मुहब्बत की
दूर जाते हुये अपनी मुहब्बत में हमारी जान ले जाना हमसे
बस यही किमत है हमारी जि़न्दगी की


