Poetry
ऐ जिन्दगी तू अपने दरवाजे़ं खोल दे
मैं सब कुछ हार कर तेरे पास आया हूँ
ना जाने मैं किस राह पर गया था भटक
अब तेरे दरवाजे़ आया हूँ
सुना है तू देती है फिर से मौका उसे, जो लड़खडा़ कर गिर गया था कभी
अब मुझे भी सम्भाल ले एक बार, बस तेरे भरोसे आया हूँ
बिक गई मेरी वो हैसियत भी जो ज़माने ने मुझे दे रखा था
जिस हैसियत के बोझ तले मैनें तुझे अनदेखा कर रखा था
तू बन जा मेरी,अब मुझे ज़मानें में अपना कोई दिखता नहीं
ज़माने ने दिये बडे़ घाव मुझे,वो घाव मेरे अब भरतें नहीं
मैं तो बन चुका था इस ज़मानें का,पर ये ज़माना मेरा हुआ नहीं
कल दौर था शानों शौकत था, अब मेरा वो दौर रहा नहीं
वो सबकुछ कितना नकली था,एक तेरा अपना होना ही असली था
जो ग़लती हर बार दोहराई मैनें, अब उसे मिटानें आया हूँ
अब दरवाजे़ अपने खोल दे जि़न्दगी
मैं बस तेरे भरोसे आया हूँ


