Poetry
ना जानें क्या मजबूरी है, अब खुद से भी बडी़ दूरी है
ना रही पहचान खुद की अपनी परछाईं से भी
मेरी खुद से कैसी ये दूरी है
वक्त की कई परतें बिछ गईं मेरे वजूद पर
नज़रें टिकी रहती हैं आज उन राहों पर
पर रो भी नहीं सकतें है अपनी तबाही पर
ये अंजाम हो गया जि़न्दगी का हम चुपचाप देखते रहें
आँखों से बहने को आंसू उमड़तें रहें
कैसे कहें की अब ताकत नहीं है सिमटनें की
कुछ ऐसे बिखर गयें हैं हम
खुद ही खुद से मिलने को तरसतें हैं हम
ये ग़म कबका कर चुका तबाह हमें
आबादी की कोई दिखती नहीं वजह हमें


