Poetry
इस दिल पे बोझ बडा़ भारी है
गुज़र गया वक्त रौनक का ,अब पतझड़ की बारी है
रही ना अब कोई रोशनी, अब बस अंधेरों से वस्ता है
हर बार बचा लिया खुद को, अब टूटने की बारी है
ना रही उम्मीद अब खुद से भी
किसी और से रखी उम्मीद का क्या करें
जल गयें अरमान सारें
अब बस इन अरमानों की लाशें बाकी हैं
खफा़ तकदीर ही हो गयी
किसी और के गुस्ताखी की बात क्या करें
जिन्दगी बन गयी एक लाश सी
अब इस लाश का क्या करें
जान अभी भी जो बाकी सी है बस उसका निकलना बाकी है
लुट गया मेरा बसंत, अब बस पतझड़ की बारी है

