Poetry
ये बेबसी भी ना जाने क्यों पीछे पडी़ है
ये जिन्दगी अपनी जि़द पे अडी़ है
है हूनर हममे भी जिन्दगी को जीने का
पर जिन्दगी भी किसी और गली में गुमनाम पडी़ है
है ये वक्त का सितम या अपनी ग़लती है
ये जि़न्दगी हर ज़ख्म पर नमक छिड़कती है
उन ज़ख्मों की भी क्या ख़ता जिन्हें भरने की मोहलत ना मिली
है जि़न्दगी की आंखे इस पर दर्द से मिली
तबाही की तो बस एक वजह काफी है
भला जि़न्दगी में दर्द के सिवा क्या बाकी है
पता चली ना वजह क्यों सारे अरमान तबाह हो गयें
जि़न्दगी ने छोडा़ ऐसा साथ हम बस बर्बाद हो गयें


