अब खै़र करें हम क्या खुद की

Law life aur multigyan
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Poetry


अब खै़र करें हम क्या खुद की 

अब हर पल में परवाह बस उसकी बाकी है

क्या हम अपनायें किसी और आदत को

खुद में अब एक बस आदत उसकी बाकी है

हर वक्त ख़याल बस उसका है

ना अपनी फिकर कोई बाकी है

अभी तो बस शुरूआत हुयी है

मुहब्बत की बेचैनी अभी बाकी है

अभी तो सम्भाल के रखा है खुद को

उसकी मुहब्बत में खुद को लुटाना बाकी है

जो लुट गये तो ग़म ना होगा, मुहब्बत मे शुमार अपना भी नाम होगा

अभी तो बेनाम से हैं हम, अभी मुहब्बत में नाम कमाना बाकी है

कब तक रखेंगे खुद को मुहब्बत में मुहब्बत से जुदा 

उसका होकर खुद को मिटाना बाकी है


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