ना लगी ख़बर कब ये वक्त गुज़र गया

Law life aur multigyan
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Poetry


 ना लगी ख़बर कब ये वक्त गुज़र गया

जो दौर कभी अपना था वो दौर बदल गया

कुछ किस्सों कुछ कहानियों में सारी उमर सिमट गयी

ये गुमनामी ना जाने आकर कब मुझसे लिपट गयी

अब वक्त के आईनें में दफन मेरा हर किस्सा है

जो था पहचान मेरी कभी 

अब वो किसी की पहचान का हिस्सा है

वो लम्हें सारे बिखर गयें

बीते वक्त में कहीं पर सिमट गयें

अब बस उन लम्हों की राख बाकी है

ये राख गुज़रे दौर की झाकी है

जाने कब मेरा जहां ये उजड़ गया

ना जाने किस ठोकर से ये बिखर गया

अब बस चूर हुये मेरे ख्वाबों की बिखरी सी लाश बाकी है

जो गुज़र गया दौर अब बस उसकी राख बाकी है


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