Poetry
निःशब्द पडे़ ये शब्द भी आज बोल पडे़
आंखों से लिपटे अश्क भी आज छलक पडे़
जिन भावो ने उमड़ घुमड़ कर खुद को फिर भी रखा था बांध
वो भाव सारे आज छलक पडे़
जिन होठों पर खुशियों की मुस्कान छायी थी बरसों पहले
बरसों से थें पडे़ मौन जो
वो अपनी मुस्कान के खातिर तरस पडे़
जाने किस बात के बोझ तले
ये अपनी मुस्कान से दूर चले
जिनमे शोर नहीं था कुछ ,सुनसान सा जिनका रस्ता था
वो अपने हर किस्से को कहनें खातिर यूं हीं मचल पडे़ं
निःशब्द पडे़ ये शब्द भी आज ना जाने क्यों बोल पडे़ं


