Poetry
ये बेचैन सा दिल भी यूँ हीं सुकून कहाँ पाता है
बस तेरी चौखट पर आकर खुद को गु़लजा़र पाता है
ज़माने के इस शोर में हमारी महफिल कब सज पाती है
ये थकान भी बस तेरी एक झलक पाकर खुद की थकान भूल जाती है
हर कदम पर हमें बस तेरी ज़रुरत है
इश्क में सब हो जातें हैं महबूब की रजा़ के गुलाम
ये इश्क की फितरत है
हमें तन्हाई में भी तेरी यादें रौनक दे जातीं हैं
पर कुछ वक्त के लिये ये हमें तन्हा भी कर जातीं है
हमें खुद की आदत की भी ज़रुरत नहीं
बस तेरी आदत ही काफी है
कर चुकें हैं हम तुझ संग इश्क की ख़ता
अगर हो ये हिमाकत, इश्क हमारी अपनें महबूब से माफी है


