इस ज़माने के दस्तूर ने

Law life aur multigyan
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Poetry


इस ज़माने के दस्तूर ने हमारा ना मिलना तय कर रखा है

पर मुहब्बत ने हमारा नसीब एक साथ बांध रखा है

क्या खौफ करें ज़माने के इन बेदर्द लोगों का

मुहब्बत ने हमें महफूज़ कर रखा है

अगर ये ज़माना मिटा भी देगा हमारी परछांई को

फिर भी वो ना छू सकेगा हमारी मुहब्बत की परछांई को

तय कर रखा है हमने अब बस मुहब्बत के लिये ही जीना है

पर ज़माने से डरकर मुहब्बत से अलग ना होना है

अब हो अलग खुद से खुद का ही वजूद

पर मुहब्बत के वजूद से पल भर के लिये भी ना अलग होना है

ज़माना भले हो अपने जीत के जश्न की तैयारी में

पर ना हम होने देंगे इसकी जीत ,ये हमनें भी तय कर रखा है


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