Poetry
ये इल्जा़म है हमपर ,हमनें उनकी रुसवाई की है
वो क्या जाने उनकी मुहब्बत में हमनें नाम अपनें तन्हाई की है
वो लौट गयें जहां में अपने, हमें इल्जा़म देकर
जाते वक्त मुस्कुरा गयें हमें बर्बादी देकर
वो सारे ज़माने से कह आये हमारी मुहब्बत में मिलावट थी
पर ये ना कहा किसी से दो पल उनकी मुहब्बत मे हमारे लिये कितनी दिखावट थी
नाम देकर हमें वो गुमनाम कर गयें
ना दिखा सकें हम किसी को हमें वो ऐसा घाव देकर गयें
ये हालात ग़लती है या महबूब साजि़श है
ये ज़माना ना सही पर हम उसकी हसरत से वाकिफ हैं
वो कर ले कोई ख़ता फिर भी इस दिल में उनके लिये बस मुहब्बत है
हमें बर्बाद किया पर हो जा तू आबाद बस इतनी सी चाहत है


