ज़रा ठहर जा रे मन इस पल में

Law life aur multigyan
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Poetry


ज़रा ठहर जा रे मन इस पल में

है जिन्दगी की झलक इस पल में 

ज़रा गुज़रे वक्त के पन्नें पलट

ज़रा दिल को बहल जाने दे इस पल में

जो खो गया वो क्या फिर मिल पायेगा

जो मिला है उसे छीन कौन पायेगा 

ना मिल सका जो छोड़ कर उसकी परवाह

जो मिला है उसका जश्न मना ले इस पल में

ओ रे मन ज़रा ठहर जा इस पल में

कुछ खुद से गुजा़रिश कर, ज़रा खुद से मनमानी कर

क्या पता फिर कब तू अपने लिये ठहर पायेगा

ज़रा खुद को बेफिकर कर, ज़रा बेपरवाही कर

क्या पता आगे कब ये दौर आयेगा

ज़रा ठहर जा रे मन इस पल में

जो जी ना सका पल कभी, वो पल जी ले इस पल में

 


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