उन नजा़रों के हम गु़लाम हो गयें

Law life aur multigyan
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Poetry



उन नजा़रों के हम गु़लाम हो गयें

जिन नजा़रों में तेरी परछांई भी दिखी

अब बस तू आ जा सामनें एक बार

तूझे देखे बिन ये सांसे रुकीं

हमें आता नहीं करना इज़हार

फिर भी इस दिल की पुकार सून ले तू एक बार

तेरी चाहतों में हम यूं गुलाम हो गयें

इंतजा़र के लम्हें तमाम हो गयें

एक तेरी परछांई की झलक कर रखी है कैद दिल में

तेरी झलक की चाहत में जाने कितनें पल हराम हो गयें

तेरे दिदार की चाहत लिये हम ज़मानें से अंजान हो गयें

जिन नजा़रों में पायी तेरी झलक, उन नजा़रों के हम गुलाम हो गयें



 

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