Poetry
क्यों ना जाऊं उस ज़माने से दूर ,जो ज़माना कभी मेरा हुआ ही नहीं
हर बार अपना दर्द बयां किया मुझसे ,पर मेरा दर्द कभी सुना ही नहीं
राहें मेरी सुनसान हुयीं, ये जि़न्दगी भी बेजान हुयी
मुझसे उधार लेकर मेरी ही सांसे, मेरा सहारा ये कभी बना ही नहीं
कब तक करुं इस ज़मानें का इंतजा़र मैं
इसनें कभी मेरा इंतजा़र तो किया ही नहीं
बह चली आंसुओं की धार सी
ये जि़न्दगी हो गयी किसी मुरझाये से अंगार सी
जो जला सकता नहीं खुद, रौशनी खुद भी दे सकता नहीं
किसी बुझते हुये दीये सा, जलने की कोशिश करती लौ सी
खुद को बुझा कर दिया रौशन इस ज़माने को
अब इसे हमारी ज़रुरत कहाँ
जि़न्दगी गिनती अपनी आख़री सांस, अब इस आखरी सांस की ज़माने को ज़रूरत कहाँ


