ये गूंज मधुर सी है

Law life aur multigyan
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Poetry


ये गूंज मधुर सी है, ये महक मधुर सी है

जिसकी चमक से चमक उठा है संसार  

वो चमक मधुर सी है

बीतीं रातें बडी़ घनेरी थीं, रौशनी का कोई निशान ना था

खुद अपने ही वजूद का कोई पता ना था

पर अंधेरा अब छंट सा गया है

दुखों का पहरा हट सा गया है

आया सवेरा अनन्त सा है,विस्तार इसका गगन सा है

इस सवेरे की चमक मधुर सी है, इसकी महक मधुर सी है


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