Poetry
समंदर की चाहत तो हर नदी की फितरत है
नदी बस होकर रह जाये समंदर की उसकी बस इतनी सी हसरत है
खुद के वजूद को खो कर मिल जाना हमसफर के वजूद में
ऐसी मुहब्बत हो जाती है मुकम्मल
ये मुहब्बत की फितरत है
जो नाम मिले बस महबूब को मिले
खुद के इश्तेहार की मुहब्बत में क्या हसरत है
मुहब्बत में भला कब खुद के रुतबे की चाहत किसे है
मिट जाये आखिरी निशान भी मुहब्बत में
महबूब से अलग पहचान मुहब्बत में बस आफत है
नदी अपना किनारा गवां कर समंदर को अपना आशियाना बनाती है
खुद के वजूद को खो कर खुद को मुहब्बत से मिलाती है
मिट जाये मुहब्बत में हर वो दास्तां जो हमारे अकेले की लिखी गयी
जुड़ कर नाम महबूब से हो जाये नाम आशिकों में शुमार बस इतनी सी हसरत है


